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भार्गवी रविन्द्र। (विधा :कविता) (एक दुल्हन के सपने| सम्मान पत्र)

शीर्षक : रिश्तों की डोर
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आजकल उसके दिल में हलचल है,एक गहमागहमी है
पलकों की चिलमन के नीचे सपनों की चहलक़दमी है
दिल की दहलीज़ पर आकर बहारों का कारवाँ जो ठहरा
होंठों पर हल्का सा तबस्सुम,आँखों में तैरने लगी नमी है ।

वह शादी के पवित्र बंधन में बंध नये रिश्ते जोड़ने चली है
फूलों से जैसे सज गईं राहें, दामन में जैसे भर गई कली है
दिल में हसरतों का सैलाब,आँखों में नये घर के सपने लिए
वह दुल्हन है ,बहारों की पालकी में होकर सवार चली है ।

चाँद का टीका माथे पर सजाए, ओढ़कर तारों की चुनरी
होंठों पर फैली नई सुबह की लाली, चेहरा शर्म से सिंदूरी
हाथ चूड़ियों से भरे , कानों में बाले झूमते , पैरों में पायल
घूंघट में छुपाए नूरानी चेहरा,वो चली अपने पिया की नगरी।

बाबुल की गलियाँ छूटी…नया घर,नये रिश्ते,नया परिवेश
मंगल गान, करतल ध्वनि ……देहरी लाँघ हुआ गृह प्रवेश
ख़ुशियों की लहर दौड़ गई , अरमानों ने जैसे ली अंगड़ाई
आँचल भर गया दुआओं से ,बड़े-बुजुर्गों के आशीष अशेष ।

आँखों में इंद्रधनुषी ख़्वाब थे ,मगर कहीं छुपा डर भी था
निभा पाऊँगी वो परंपराएँ, सपनों में बसा एक घर भी था
सोचती वो खड़ी रही आईने में अपना नया रुप निहारती
दो बाहों के घेरे में महफ़ूज़ वो भी थी उसका घर भी था।

ढलती रात सजा लाई थाल में एक प्यारी सी सुहानी भोर
वो चल पड़ी अपने हमसफ़र के संग नई मंज़िल की ओर
मन में एक अटूट विश्वास था, उसके सब सपने साकार होंगे
प्यार वाली जमीं पर दुआओं वाली छत है और रिश्तों की डोर !
Copyright(C) भार्गवी रविन्द्र.

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