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भार्गवी रविन्द्र (विधा : कविता) (मेरा # दिल कहता है | सम्मान पत्र)

ढल रही है रात ख़ामोश सी चाँद भी अब जाने को है
किसका है इंतजार आँखों को न जाने,कौन यहाँ आने को है ।
मेरा दिल कहता है ,चलो सज़ाएँ इन आँखों में स्वप्न नये !

शून्य में बोलो पथिक सी मैं निरंतर भटकती रहूँ कब तक
गुमसुम निविड़ अंधकार में चित्र सी अंकित रहूँ कब तक?
मेरा दिल कहता है ,चलो इन में भर दें कुछ रंग नये ।

मंदिर में जलती दीप शिखा सी,जलता ये जीवन पल पल
और धुएँ के अंबार में कहीं डोलता मेरा स्वप्न चंचल।
मेरा दिल कहता है ,चलो गुनगुनाएँ कुछ गीत नये !

पर्वतों पर उतरते शाम सी ,आँखों का ये सूनापन
नदी की चंचल चपल धारा सी ,मेरा ये उद्भ्रांत मन।
मेरा दिल कहता है ,मिलकर जलाएँ कुछ दीप नये !

समन्दर की गोद में ढलते सूरज की अरुणाई
रेत के घरौंदे बनाती तोड़ती ज़िदगी की परछाईं।
मेरा दिल कहता है ,चलो तोड़ लाए कुछ तारे नये !

जीवन की इन राहों में ख़ूद से बहुत दूर हो गए हम
मंज़िल के क़रीब पहुँचकर मंज़िल से दूर हो गए हम।
मेरा दिल कहता है चलो ढूँढ लाए कुछ रास्ते नये !
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित ©
भार्गवी रविन्द्र.

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