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प्रमोद’प्रकाश’ (सागर किनारे प्रतियोगिता | सहभागिता प्रमाण पत्र )

इस बरसते हुए मौसम में
सागर की लहरों के उठते उफान में जैसे हर लफ्ज़ मचल उठा हो
तुम्हे अपने करीब पाकर
लहरों के किनारे बैठ जाते है हम
हमारा तन बदन गीला हो जाता है
तुम्हारे करीब होने का अहसास
एक रोमांच सा पैदा करता है
कवि मन लिखने को बाध्य करता है
इस रुमानी मौसम में
सागर से आती सर्द हवाऐं
तुम्हारी उडती जल्फें मचलने लगी
तेरी उंगलियों की पोरों का स्पर्श
मेरे सर्द हाथों को जैसे भर देता हो
तेरे बदन की गर्माहट से लबरेज़
मेरी कविता के अल्फाज
होले होले सर्द से होने लगे
जैसे जश्न सा मना रहे हों
फिर सागर की लहरों को हमें आगोश में भर कर दूर फैंकना
एक खूबसूरत अहसास से भर देना
हमारे रिश्ते को नया मुकाम दे गया
सागर के किनारे की इस पल की महोब्बत को नया रंग दे ही गया।

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