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प्रमोद मूँधड़ा (UBI उस गली में प्रतियोगिता | वरिष्ठ कविगण)

इस गली से उस गली.. उस गली से इस गली
खुद से भी बेखबर.. लिए मन में खलबली
चलते हुए आदमी थके थके उदास से
जलते हुए आदमी अंजानी तपिश से
अनजानी आस की खातिर कितने प्रयास
अनबुझी प्यास की खातिर कितने गिलास
प्यास मिटती नहीं.. आग बुझती नहीं
आशाओं के इंद्रधनुष.. आत्मा संवरती नहीं
कोई सोचता नहीं किस पथ पर चल रहा
निश्छल खुशियों की ओर राह ये जाती नहीं ।

यूं ही गलियों से गुजरते गुजरते.. गुजर जाता है आदमी
नहीं बनते किसी भी गली में कदमों के पदचिन्ह भी
मेरे मितवा.. गलियां कब पूछती हैं किधर जा रहे हो
और कब बताती है.. किस गली गुजरना है ?
जीवन के गलियारे में झांक कर जरा पूछना
कहां मेरे कदम भटके.. क्यों मैं रहा भीड़ में अटके
मेरे मितवा.. जरा सोचना.. मनन करना.. और
कभी चलना उस गली.. जो जाती है स्वयं के शिखर तक
जो पहुंचाती है अंतस में प्रकृति से परमात्मा तक
जो पहुंचाती है.. अतृप्ति से परितृप्ति तक
मेरे मितवा.. कभी तो गुजरो उस अंतस की गली
बहुत प्रीतिकर होगी यात्रा.. मूलाधार चक्र से सहस्त्रार तक..!!

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