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डॉ शैलबाला दाश ( चक्का जाम प्रतियोगिता)

इतिहास है गवा,
घीसता घसीटता जीवन कैसे आसान बनगया!
रुहानी तड़प हलफ़ से कैसे सुहानी बनगया!
असभ्यता कैसे भव्य सभ्य बन गया!
फ़िर अचानक चक्का बन्द भौंचक्का आम बन गया।
राज रास्ता हो या किसी अंधेरी गली,
बन्द चक्का सब को एक जैसे खली।
बन्द हो जाता है आधा अधूरा विकाश ,
सब को खलता है,एक जैसा संत्रास।
न जाने कब अचानक बन्द हो जाएगा चक्का।
हाथो से छुट जाएगा हाथ लगे मौका।
छुट जाएगा हाथों से आसान सा छक्का।
खेलती खिलती जीन्देगी हो जाता है ठप।
समय चीख उठता है,अरे बाप रे बाप!
कोई बेकारी से समझौता करता ही फिरें,
बड़ी मुस्किल से आया होगा नौकरी की तारिख की तारें।
करें तो करें क्या करें बेचारे!
गंवा न पडें हाथ लगे रोटी के कौरें!
चलता फिरता जिंदगी में अगर किसी को अचानक पड़ जाएगा दौरा,
चक्का बंद से उड़ जाता है प्राण पखेरु प्यारा,
इलाज,अस्पताल सब रह जाता है बहुत पिछे बेचारा।
एक दिन का चक्का अगर हो जाए जाम,
बिगड़ जाता है करोड़ का हिसाब, निकल जाता होगा कईयों के दम।
चक्का किया था युग का कायाकल्प परिवर्तन।
फिर से और एक अंधेरी शाम होगा आम,और एकबार घुमेगा समय का चक्का,लाएगा विवर्तन,
दौरा होगा अनदेखा आसमान।

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