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अमित गुप्ता (UBI धरती माँ प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र (कविता ))

धरती की सुंदरता
इसके पेड़ पौधे
शैवाल कवक
चहूँ ओर फैली
ये हरियाली है
छीन रहे हम
नासमझ…
पाने को क्षणिक
खुशहाली हैं

धरती के आभूषण
सागर,नदियाँ
झील,झरने
सर, पुष्कर, पोखरा,
जलवान, सरसी,ताल
ये तालाब
सरोवर सारे हैं
छीन रहे हम
नासमझ…
पाने को क्षणिक
खुशहाली हैं

देखो कैसे
ये मौसम चक्र बदलते
फैलती नित
नई-नई बीमारी हैं
अब तो संभल जाएँ
हमें समझनी कुछ
अपनी जिम्मेदारी हैं
आने वाली पीढ़ियों का
सुख-चैन
छीन रहे हम
नासमझ…
पाने को क्षणिक
खुशहाली हैं

धरती माँ के पर्यावरण का
तनिक सा तो ध्यान करें
आओ पेड़ लगाकर
इस धरा का सम्मान करें
क्षणिक फ़ायदे का
का करें त्याग
अब तो समझदार बनें…..

✍🏻’अमित’

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