Generic selectors
Exact matches only
Search in title
Search in content
Post Type Selectors

अपर्णा झा (अँधेरा प्रतियोगिता | सहभागिता प्रमाण पत्र )

स्याह काली रात, घनघोर अंधेरा साथ
राह ना सूझे, बाट ना बुझे
उम्मीद की कोई थाह ना फूटे
अपना, पराया, माई – बाप
जब कहीं कोई हाथ ना थामे
हर तरफ अंधियारी गलियां, डरावनी राहें
उनमें छिपे गुमनाम, नामचीन
बस मौका मिलते ही लूट रहे हैं

जिधर देखो, चीखें हैं, चीत्कारें हैं,
समाज शून्य में झांक रहा है
शासन सत्ता के मद में डूबने की जुगार
ताक रहा है
ऐसे में हम आप अपनी आब
बचाने वाले बनें, समय अब
बस यही एक पथ दिखला रहा है

Leave a Comment