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अनु साहनी (सागर किनारे प्रतियोगिता | सम्मान पत्र)

लहरों का मुकद्दर है , सागर में जा समाना,
फिर साहिल से टकराकर, पड़ता है लौट जाना।

ठहरा नहीं कभी भी, चाहे कैसी भी हो बहारें,
उमड़े हुए सागर का, यूँ बेखौफ हो बहते जाना।

सागर को भी पता है, उनकी न हो सकेंगी ,
इन लहरों का टकराकर , यूँ चुपचाप ही गुज़र जाना।

सागर की अपनी क्षमता है , साहिल ही इसका ठिकाना है।
लहरों के उठे बवंडर में, माँझी ने पार लगाना है।

मैं संजीदा साहिल हूँ, सागर से गहरा नाता है,
घेरें लाखों तूफान मगर, मेरी फितरत बदल न पाता है।

गर्दिंशों में भी रहकर , सितारे बुलंद रहते हैं,
देखो इस अथाह सागर के, किनारे बुलंद रहते हैं।

जब डोले यह जीवन नैया, उठते तेज़ बवंडर में,
हाथ न रोको , बढ़ते जाओ , जबतक है स्पंदन साँसों में।

निर्भीक बने इस जीवनसागर में ,आगे बढ़ते जाना है।
बुझे चिरागों को जलाकर , अँधकार दूर भगाना है।

विशाल समंदर फैला है, आखिर साहिल पर आना है।
उम्मीदों की पतवार पकड़ , यह भवसागर तर जाना है।

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