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अनामिका जोशी।(विधा : लघुकथा) (साथी हाथ बढ़ाना | सम्मान-पत्र)

मां ! आज मैं बहुत खुश हूँ !
अच्छा !
लेकिन आज ऐसी क्या बात है ?
पन्द्रह दिन बाद तुम्हारी शादी है, तुम्हारा डॉक्टर बनने का सपना पूरा हो गया है और तुम्हारे होने वाले पति भी डॉक्टर है ।
और ऐसी क्या बात है जिसने तुम्हे इतना खुश कर दिया है ?
अरे ! तुम जानती नहीं मां,
आज हॉस्पिटल में एक चिकित्सकों का दल उस महामारी से जूझने के लिए हमारे अस्पताल में नियुक्त किया गया है उसमें मुझे सब का प्रतिनिधित्व करना है!!
“क्या “??
और तुम इसमें खुश हो रही हो ?
नहीं, नहीं ! मेरे हिसाब से तुम्हें नहीं जाना चाहिए ।
नहीं माँ ,तुम समझती नहीं , मुझे भी देश सेवा का एक मौका मिला है । अरे, यह सब बड़ी-बड़ी बातें किताबों और टीवी ,अखबारों में ही अच्छी लगती है।
नहीं माँ ! मैं यह अवसर गवाँना नहीं चाहती!
अरे !! लेकिन सोचो ,अगर जमाई बाबू को पता चल गया तो वह क्या सोचेंगे ?
तुम्हारे ससुराल वाले क्या सोचेंगे ?
कुछ नहीं सोचेंगे माँ!!
अरे ,रोहित तुम !
हाँ ,मैं तुम्हारी सारी बातें सुन चुका हूँ ।
प्लीज रोहित, तुम भी मुझे माँ की तरह मना मत कर देना। सुधा ! क्या तुम मुझे अभी तक पहचान नहीं पाई?
अच्छा, सॉरी! कहो ,क्या कहना चाहते हो ?
सबसे पहले तो यह कि “साथी हाथ बढ़ाना “
हम दोनों मिलकर इस पुण्य काम को अंजाम देंगे ।
और मैं तुम्हारे लिए कुछ लाया हूँ, आशा करता हूँ, तुम स्वीकार करोगी ।
जरूर !! क्यों नहीं ?
रोहित ने हाथ आगे बढ़ाया । उसमें सिंदूर था। सुधा मैं चाहता हूँ कि हम हमारे माता-पिता के सामने यहीं सादगी से हमारा विवाह हो जाए ।
मुझे ना तो दहेज चाहिए और ना ही बहुत ज्यादा रुपया पैसा खर्च करके भव्यता से और दिखावा करने वाली शादी चाहिए ।
फिर हम मिलकर देश सेवा में अपना योगदान देंगे ।
बोलो मंजूर है?
धन्यवाद रोहित! मैं जानती थी तुम मेरे इस फैसले में जरूर मेरा साथ दोगे ।
माँ ,बस आपका आशीर्वाद चाहिए ।
मुझे भी बहुत खुशी है कि मैं तुम्हारे जैसे बच्चों की माँ हूँ।
एक पल के लिए तो मैं भी स्वार्थ ही हो गई थी । ईश्वर तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करे।
और हम सब मिलकर एक स्वस्थ देश बहुत जल्द पाएँ। चलो फिर हम सब मिलकर साथ बढ़ते हैं और देश सेवा के लिए अपना योगदान करते हैं।
(स्वरचित) अनामिका जोशी “आस्था “

 

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