
पूनम संधू ( समय प्रतियोगिता | युगान्तकारी रचना हेतू प्रशंसा पत्र )
पल पल उड़ रहा है वक़्त तिनके की तरह सराह ढूंढ रहा हो जैसे परिंदे की तरह।। ओझल होता लम्हा कराह रहा है “गले लगा

पल पल उड़ रहा है वक़्त तिनके की तरह सराह ढूंढ रहा हो जैसे परिंदे की तरह।। ओझल होता लम्हा कराह रहा है “गले लगा

सुनो!! घड़ी की टिक-टिक क्या कहती? मैं समय हूं–सर्वशक्तिमान– भूत, भविष्य और वर्तमान मेरे अलग-अलग रूप मेरी यही पहचान। मैं अनादि मैं अनंत मैं ही

समय ने कब सोचा क्या गुज़रती है उसके गुज़र जाने के बाद ************************************************* बहुत देर तक ठहरा रहा ‘वो ‘ * मेरी दहलीज़ पे कुछ

उठो चांदनी । बहुत देर हो गई फिर हमें शहर भी जाना है । तेरी आगे की पढ़ाई के लिए किसी अच्छे कॉलेज का पता

हमने हमेशा अपने बड़े बुज़ुर्गों के मुँह से अक्सर यह वाक्य सुना है,’समय बड़ा बलवान’ । बचपन में हमें इस पेचीदा सवाल का कोई भी

घड़ी की सूइयोंपर चलता आज का जीवन कुछ यांत्रिक सा लगता है, तसल्ली के दो क्षण मिलना भी मुश्किल सा लगता है, जिंदगी की जद्दोजहद

रहे खिसकते धीरे धीरे धड़ियों के ये कांटे इसी समय ने जीवन के पल कितने टुकड़ों मे बांटे इसने ही भूगोल को बदला, इसने ही

सुना था वक़्त होता है मरहम भर देता वो सारे ज़ख्म कुरेद कर देखा जो इक ज़ख़्मी मन घाव हरा था अन्तर्मन वक़्त ने जहां

कौन जी सका वक़्त के मुताबिक ये जहान हसरतें कब सबकी पूरी हुई यहां वक़्त ने बदली सबकी दिशा वक़्त के आगे बेबस हुआ हर

मैंने .. हर रोज .. जमाने को .. रंग बदलते देखा है …. उम्र के साथ .. जिंदगी को .. ढंग बदलते देखा है ..
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