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भार्गवी रविन्द्र (विधा : कविता) (मेरा # दिल कहता है | सम्मान पत्र)
ढल रही है रात ख़ामोश सी चाँद भी अब जाने को है किसका है इंतजार आँखों को न जाने,कौन यहाँ आने को है । मेरा

ढल रही है रात ख़ामोश सी चाँद भी अब जाने को है किसका है इंतजार आँखों को न जाने,कौन यहाँ आने को है । मेरा

भेद मिटाकर ऊंच-नीच के समता का आग़ाज़ करूं जात-पात पात के बंधन तोड़ दूं मानववाद की बात करूं बस ऐसा कुछ हो जाए दिल मेरा

दिल की लगी है जनाब !! कोई दिल्लगी नहीं !! @रीता बधवार (स्वरचित) (सर्वाधिकार सुरक्षित)
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