
रजनी सरदाना । (विधा : कविता) (काल करे सो आज कर, आज करे सो अब | प्रशंसा पत्र)
रे मन मनचले,खुशियाँ बटोर लें,कल का नहीं कोई भरोसा, मिले ना मिले तुझे कहीं,ये बारिश का बोसा उड़ान भर पंछियों सी ना पल का कर

रे मन मनचले,खुशियाँ बटोर लें,कल का नहीं कोई भरोसा, मिले ना मिले तुझे कहीं,ये बारिश का बोसा उड़ान भर पंछियों सी ना पल का कर

कल एक छलावा है …… जो लौटकर फिर नहीं आने वाला वो बीता कल है जिसकी कोई पहचान नहीं वह आने वाला कल है अपना

आज ही चांँद को गली में अपने बुला लेते हैं संग खिली चांँदनी हम भी खिलखिला लेते हैं नग़्में बिखरे हैं इस मौसम- ए -बहार

तुम आने वाले कल पर क्यूँ उम्मीद लगाते हो वक्त को अपने हिसाब से क्यूँ आज़माते हो छोड़ कर इच्छाशक्ति के प्रबल शस्त्र को अपने

वक्त का पहिया अजब है, ये सदा चलता ही जाए, बीत जाता है जो लम्हा, लौट कर वो फिर न आए ! भूल जाता है

पलक झपकते ही , दृश्य बदल जाता है ,, हर धड़कन पर , जीवन नया रंग दिखलाता है ,, अवसर निकल जाने पर , अक्सर

समय की कल को जिसने पहचाना,आज के महत्व को जिसने है जाना, मुठ्ठी में है तक़दीर उसके वश में है ज़माना…. @ रीता बधवार
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