
इला पारीक। (विधा : लघु कथा) (धोखा | सम्मान पत्र)
फेसबुक पर अंगुलियां चलाते चलाते फ्रेंड रिक्वेस्ट पर क्लिक किया तो देखा बहुत सारी फ्रेंड रिक्वेस्ट आई हुई है। उनमें से एक नाम जाना पहचाना

फेसबुक पर अंगुलियां चलाते चलाते फ्रेंड रिक्वेस्ट पर क्लिक किया तो देखा बहुत सारी फ्रेंड रिक्वेस्ट आई हुई है। उनमें से एक नाम जाना पहचाना

धोखा खाकर ही जिन्दगी समझ आई।वर्ना मेरे लिए तो सब अपने ही थे। वैशाली तांबे

धोका करना और धोका सहना दोनो ही गलत है , क्यूँकि धोका करने वाला और सहने वाला दोनो ही अंत में , अपनी मन की

.*तेरी इंसानियत का हश्र* तेरी रूह को नेस्तनाबूत कर के कई बार खंजर घोपे जाएंगे। दुश्मनों से क्या खौफ तुझे ये तेरे अपने है

कलियुग में जो दिखता है, बड़े लाभ का मौका। देख भाल कर डग रखना , वहीं छुपा है धोखा । फितरत ये इन्सानी है, हरदम

‘मां फीस के रुपये दे दो’ मेघा ने कहा तो रीमा ने कहा ,दराज में से ले ले। रीमा ने पति की अकाल मृत्यु के

राम लाल एक छोटे से गांव में अपने परिवार के संग रहते थे।उनके परिवार में उनकी पत्नी पार्वतीबहन,सत्रह साल की उनकी बेटी और एक उनका

क्या अजब ये हादसा है, इस जहाँ को क्या हुआ है, दौर कैसा आ गया है, चल पड़ी कैसी हवा है ! आदमी ही आदमी

धोखा केवल एक शब्द नहीं है, यह एक कलंक है।क्योंकि धोखा नियति नहीं है धोखा चयन है।यह इन्टरनेट और सोशल मीडिया का जमाना है, सोशल

मुफ़लिसी के इस दौर में रोटी भी क़ीमती होती है, यहाँ तो बस धोखे ही मुफ्त में मिलते है साहेब।। ©डॉ. श्वेता प्रकाश कुकरेजा
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