
सुशीला गंगवानी। (विधा : लघुकथा ) (जीवन – आनंद | प्रशंसा पत्र )
मैं सुजाता अपने बच्चों और पति के साथ एक छोटे से शहर में रहती हुं। हम चार बहनें हैं जो सभी अपने अपने ससुराल में

मैं सुजाता अपने बच्चों और पति के साथ एक छोटे से शहर में रहती हुं। हम चार बहनें हैं जो सभी अपने अपने ससुराल में

‘ये क्या है माँ? ये दो रुपये का बलून, ये पाँच रुपये की लोकल आइसक्रीम कितनी चीप है ये।मैं नहीं खाता ये सब पता है

भूखा व्याकुल शिशु अमृत मातृ आँचल अपार जीवन आनंद स्वरचित रजनी सरदाना *अवलेखा की उड़ान🕊*

खिले चेहरे निरोगी भारत जीवन – आनंद © प्रीति पटवर्धन🖋️

आनंद का जन्म स्वयम् के प्रयास से होता है. ख़ुशियाँ बिकाऊ नहीं होती. जिसकी झोली में प्रेम का वास है वो आनंद से मिला हुआ

शीर्षक : ध्रुव तारा जतन से सींचा सुंदर सपना एकाएक ऐसे धराशाई हो जाय ताश के पत्तों से बने महल सा जब बीच मंझधार फंसे

“छोटी छोटी खुशियाँ” उठ सबेरे ही दाने की खातिर नन्ही गौरैयों का शोर मचाना तनिक देर कर दो जाने में तो टैरेस पर

जीवन आनंद है प्रत्येक पल का स्वाद लीजिए कुछ बीती है तो बिसार दीजिए कुछ बिगड़ा है तो संवार लीजिए खुद में ही खुद का

अक्सर हम सुनते आए हैं आनंद जीवन का है हमारे भीतर ही बस हमे खोजना है थोड़ा मुश्किल पर सही जब खुद से खुद को

मनुष्य का जीवन मिला है धन्य इसको आज कर लें आए हैं इस जगत में तो माया से पहचान कर लें वृक्ष,सलिला,संत जन से सीख
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