Generic selectors
Exact matches only
Search in title
Search in content
Post Type Selectors

इला पारीक। (विधा : लघु कथा) (धोखा | सम्मान पत्र)

फेसबुक पर अंगुलियां चलाते चलाते फ्रेंड रिक्वेस्ट पर क्लिक किया तो देखा बहुत सारी फ्रेंड रिक्वेस्ट आई हुई है। उनमें से एक नाम जाना पहचाना सा लगा तो रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली। अगले दिन मेसेज आया,-प्रणाम गुरुमाता!
मैंने लिखा -आशीर्वाद।
मुझे याद आया यह तो वही अर्जुन है जो नाम के विपरीत मूड बुद्धि था किसी तरह बारहवीं पास कर ली थी।
मैंने पूछा क्या करते हो।
अर्जुन ने बताया कि वह एस बी आई बैंक में पी ओ लग गया है। जानकर बहुत प्रसन्नता हुई। सोचा कई बार पढाई में साधारण से लगने बच्चे बाद में मेहनत करके आगे निकल जाते हैं।
फिर यदा कदा अर्जुन के मेसेज आते रहे। एक दिन लिखा कि मुझे अपने मोबाइल नंबर दो मेडम! मैं गुरु पूर्णिमा पर आपको प्रणाम करना चाहता हूँ। मैंने भी ज्यादा विचार न करते हुए मोबाइल नंबर दे दिए। फिर कभी कभी अर्जुन के मोबाइल पर फोन आने लग गये।
एक दिन अर्जुन ने दुखी स्वर में कहा कि मेरे बेटे की तबियत बहुत खराब है। मेडम मुझे एक लाख रुपये की आवश्यकता है। मैं जल्दी ही लौटा दूगा। आपको विश्वास नहो तो ब्लेंक चेक दे दू या मेरी तीन तोले की चैन दे दू।
मैंने विचार किया कि मेरे पैसे से किसी की जान बचती है तो इससे बढिया क्या बात होगी। पर एक लाख रुपये बहुत होते हैं। बहुत विचार करके मैने उसे पच्चीस हजार रुपये दे दिए।
छ महिने तक अर्जुन का न कोई मेसेज आया न फोन।
एक दिन मैंने फोन किया तो ऐसे बात की जैसे जानता ही न हो। उसका रूख ही बदल गया था। मुझे फोन और फेसबुक से ब्लॉक कर दिया। एक दिन मेरा पुराना सहकर्मी मिला ,तो मैंने अर्जुन की बात बताई।
सहकर्मी ने बताया कि “मेडम वो तो कहीं चपरासी भी नहीं है बैंक पी ओ की तो बात ही मत करो। वो सबसे ऐसे ही झूठ बोलता है।”
इस तरह से शिष्य के द्वारा मुझे धोखा दिए जाने का बहुत दुख हुआ, पर कुछ भी नहीं किया जा सकता था। सोचा- मेरा सो जावे नहीं, जावे सो मेरा नहीं। अब संतोष के अलावा कोई चारा नहीं था।
कलियुग है गुरु दक्षिणा अब इसी तरह दी जाया करेगी, यही सोचकर संतोष कर लिया।

 

Leave a Comment