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भार्गवी रविन्द्र। (विधा :उद्धरण) (एक दुल्हन के सपने| सम्मान पत्र)

“हर दुल्हन का बस एक ही सपना,सुंदर,प्यारा सा घर हो अपना
जिसमें सारे अपने बसते हो,और उनमें अपनों के सपने हँसते हो
रिश्तों को जोड़े प्यार की डोर,दिल के दरवाज़े खुले हो हर ओर
साजन की बाहों का सहारा हो और ईश्वर का सबको आसरा हो ।”
Copyright(C) भार्गवी रविन्द्र

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