* 4 जून- आक्रमण के शिकार हुए मासूम बच्चों का अंतरराष्ट्रीय दिवस*
दुनियाभर में बच्चों के कल्याण के लिए बहुत से कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद गरीब और उपेक्षित बच्चों का कल्याण नहीं हो पा रहा। कहीं वे बाल मजदूरी के शिकार हैं तो कहीं उन्हें स्कूल के दर्शन तक नसीब नहीं। कहीं उनका यौन उत्पीड़न हो रहा है तो कहीं वे कुपोषण और भूख के चलते मौत के शिकार हो रहे हैं। हर साल 4 जून को आक्रमण के शिकार हुए मासूम बच्चों का अंतरराष्ट्रीय दिवस उन बच्चों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है जो दुनिया भर में पीड़ित हैं, शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक शोषण का शिकार हैं.!दुनियाभर में बच्चों की हत्या, यौन उत्पीड़न, अपहरण और उन्हें अपंग बना देने जैसी घटनाएँ जारी हैं।
बाल यातना एवं अवैध तस्करी के ख़िलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय दिवस 04 जून को संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया जाता है. इसकी स्थापना 19 अगस्त 1982 को हुई थी.
मूल रूप से 1982 के लेबनान युद्ध के पीड़ितों पर केंद्रित इस दिवस का उद्देश्य “विश्व भर में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक शोषण का शिकार बच्चों द्वारा पीड़ित और दर्द को समझना है. यह दिवस बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है.!
बचपन हर एक के जीवन का सबसे खुशनुमा और जरुरी अनुभव माना जाता है क्योंकि बचपन बहुत जरुरी और दोस्ताना समय होता है सीखने का। अपने माता-पिता से बच्चों को पूरा अधिकार होता है खास देख-रेख पाने का, प्यार और परवरिश का, स्कूल जाने का, दोस्तों के साथ खेलने का और दूसरे खुशनुमा पलों का लुफ्त उठाने का। बाल मजदूरी हर दिन न जाने कितने अनमोल बच्चों का जीवन बिगाड़ रह हैं।ऐसे में बालक की मानसिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं।
बाल यौन शोषण एक अपराध है जिसे अनदेखा किया जाता है, क्योंकि लोग इस पर बात करने से बचते हैं। इस विषय के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करने के प्रयासों के द्वारा इस प्रकार की घटनाओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अपराधियों के मन में डर डाले जाने की आवश्यकता है। यह तभी संभव है जब लोग इसका सामना करने के लिये तैयार हों। अब समय आ गया है कि माता-पिता द्वारा इस तरह के मुद्दों के बारे में अपने बच्चों को जागरूक बनाने के लिये इस विषय पर विचार-विमर्श किया जाये। शैक्षिक संस्थानों को भी जागरूकता कैंप आयोजित करने चाहिये जो सेक्सुएलिटी (लैंगिकता) विषय पर सटीक जानकारी प्रदान करने में सहायक होंगे
इन्हें रोकने के लिए किए गए प्रयासों में थोड़ी प्रगति तो हुई है, लेकिन अभी प्रयासों को दुगुना किए जाने की जरूरत है।
अफगानिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों में तो हालात और भी खराब हैं, जहाँ व्रिदोही संगठन बच्चों के हाथों में बंदूक और हथगोले थमकार उनका बचपन लील जाते हैं। इराक, चाड, मध्य अफ्रीकी गणराज्य और अफगानिस्तान जैसे देशों में बच्चों की हालत दयनीय है। अधिकतर स्वयंसेवी संस्थाएँ या पुलिस खतरनाक उद्योगों में कार्य कर रहे बच्चों को मुक्त तो करा लेती हैं पर उसके बाद उनकी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती हैं। नतीजन, ऐसे बच्चे किसी रोजगार या उचित पुनर्वास के अभाव में पुनः उसी दलदल में या अपराधियों की शरण में जाने को मजबूर होते हैं। बाल आयोग बनाने के पीछे बच्चों को आतंकवाद, साम्प्रदायिक दंगों, उत्पीड़न, घरेलू हिंसा अश्लील साहित्य व वेश्यावृत्ति, एड्स, हिंसा, अवैध व्यापार व प्राकृतिक विपदा से बचाने जैसे उद्देश्य निहित हैं। बाल आयोग, बाल अधिकारों से जुड़े किसी भी मामले की जाँच कर सकता है और ऐसे मामलों में उचित कार्यवाही करने हेतु राज्य सरकार या पुलिस को निर्देश दे सकता है। आज आक्रमण के शिकार हुए उन मासूम बच्चों के प्रति सवेंदना व्यक्त करने का दिवस है । आज हम सभी यह प्रण ले की स्वयं के स्तर से जितना भी सम्भव हो सके
बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधायें दी जाएँ और बालकों की शोषण से तथा नैतिक व आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए।