फूल खिले हैं गुलशन गुलशन,
नहा ओस से हर नवल पुष्प,
प्रफुल्लित हुआ जा रहा।
अनूठी सुवासित अदा से,
जैसे मंद मंद मुस्कुरा रहा।
सौम्य सरल बैरागी पवन,
मस्ती से बहता जा रहा।
भीनी सुरभि मधुर मनोरम,
निष्काम सर्वत्र पसरा रहा।
सूंघ सुगन्धित सुमन रज,
मधुप सक्रिय हुआ जा रहा।
झुण्ड मनचले भंवरों का,
जैसे खींचा चला आ रहा।
गुनगुनाता गीत प्रेमिल,
मधुकर मकरंद पा रहा।
प्रकृति चक्र की श्रृंखला,
मदहोश मस्त निभा रहा।
रंग रंग के फूल खिले,
ना कोई मुंह चिढ़ा रहा।
हर डूब मस्ती में अपनी,
खुद पर ही इतरा रहा।
सुगम सहअस्तित्व सुधा,
पी उन्मत्त बहा जा रहा !
खोने पाने के हिसाब में,
ना कोई उलझा जा रहा।
ना गुलफाम फूट डालता,
ना जहर बैर का पिला रहा।
संकीर्ण स्वार्थ से हो प्रेरित,
ना आपस में भिड़वा रहा।
मूक संवादों में विशुद्ध,
प्रेम निखरता जा रहा।
खिले फूलों का गुलशन,
पाठ प्यार का पढ़ा रहा।
~श्याम सुन्दर शर्मा