भेद मिटाकर ऊंच-नीच के
समता का आग़ाज़ करूं
जात-पात पात के बंधन तोड़ दूं
मानववाद की बात करूं
बस ऐसा कुछ हो जाए
दिल मेरा यह कहता है
न्याय मिले जहां सजा तोल कर
ना कि रिश्वतखोरों को
बात कभी ना जुर्म की हो तब
सबक मिले जब औरों को
बस कुछ ऐसा हो जाए
दिल मेरा यह कहता है
मिटे कुरीति सभ्य समाज हो
कोख में ना कोई खून हो
पथ पर बढ़ती नारी भी जहां
रात या दिन महफूज हो
बस कुछ ऐसा हो जाए
दिल मेरा यह कहता है
अंत समय तक बीते जीवन
बस अपनों के बीच
बांटे सुख-दुख के पल
एक दूजे के बीच
फिर भी क्यों बोए जाते हैं
तकरारों के बीज
अब ऐसा कुछ ‘ना’ हो बस
दिल मेरा यह कहता है
(स्वरचित) अनामिका जोशी “आस्था”