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ललिता वैतीश्वरन (अँधेरा प्रतियोगिता | सहभागिता प्रमाण पत्र )

इस घनघोर काली रात में रोशनी तो फैला दो ना …
मुझे ड़र लगता है अंधेरे से एक दिया तो जला दो ना …..

मेरे जन्म से पहले तुमने सोचा था दोगे मुझे मार
सुबह के उजालों को बंद कर बिखेरोगे अंधकार

मुझे भी पैदा होते ही प्यार से सहला दो ना ……

बचपन में न दिया कभी मुझे दूध या किताब
भाई को जो तुम्हें बनाना था कोई अफसर लाजवाब
मेरे सपनों में भी एक पंख लगा दो ना ….

यौवन की दहलीज़ पर आकर जैसे बन गयी मैं कोई पतंग
सबके इशारों से लेकर छुअन तक सहती रही
अपमान अंतरंग ….
इज्ज़त के फूलों का ताज मुझे भी कभी पहना दो ना ….

शादी की दुकान में लाकर बहुत कीमती दहेज
फिर भी अंधेरी कोठरी में ही अपना जीवन रही सहेज …
पराया धन न समझो मुझको मुझसे ही वंश चला दो ना ….

अंधेरे से ड़रती हूँ मैं एक दिया तो जला दो ना ….

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