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रीता बधवार ( उत्सव प्रतियोगिता | सहभागिता प्रमाण पत्र)

हमारे देश में उत्सवों की एक बड़ी प्राचीन एवं लंबी परंपरा रही है। उत्सव शब्द सुनते ही कानों में घंटियाँ सी बज उठती हैं। भारत के
कोने-२ में वर्ष के प्राय: सभी दिनों में किसी न किसी उत्सव के मनाये
जाने का प्रचलन आम है ।
पर जनाब! अभी जो उत्सव हमसे चंद दिनों की दूरी पर खड़ा
मुस्करा है, उसकी तो शान ही कुछ
निराली है। इसे हम दीपावली के
नाम से पुकारते हैं। छोटे बड़े,अमीर
ग़रीब सभी अपने सामर्थ्य के अनुसार इसका स्वागत करते हैं ।
इसी कारण आजकल चारों ओर
घरों की लिपाई पुताई व रंग रौगन
का काम ज़ोरों से चल रहा है ।
वैसे तो इस त्यौहार के पीछे
अनेक कहानियाँ प्रचलित हैं।परंतु
लोगों का एेसा विश्वास है कि इस दिन रामचंद्र जी लंका पर विजय प्राप्त कर,चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर, सीता जी के साथ अयोध्या वापस लौटे थे।उनके आने की ख़ुशी में लोगों ने घी के चिराग़
जलाये।
दोस्तों ! आज़ ज़माना तेज़ी से बदल रहा है।आज मिट्टी के प्यारे इकेफ्रेंडली दियों का स्थान
सुंदर मोमबत्तियों एवं बिजली की रंग-बिरंगी झालरों ने ले लिया है।
इस दिन मुख्य रूप से गणपति व लक्ष्मी पूजा का विधान है।खील,
बताशे व तरह-२ की स्वादिष्ट मिठाइयों से घर- बाजा़र भरे रहते हैं।चारों ओर उल्लास और उत्साह के वातावरण में लोग पूजा के बाद
रात में सुंदर आतिशबाज़ी व पटाखे आदि भी चलाते हैं ।
हमें इस सुंदर पर्व को बहुत
ही सजग व सलीक़े से मनाने का प्रयत्न करना चाहिये।इस उल्लास में हमें उन्हें भी शामिल करना चाहिये जो आर्थिक रूप से कमजो़र व पिछड़े हुये हैं।इस बात का भी पूरा ध्यान रखना चाहिये कि ऐसे पटाख़े व आतिशबाज़ी न चलायें जिनसे पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता हो, जो किसी वृद्ध या बीमार को कष्ट पहुँचाता हो ।
ध्यान रहे हमारे घर में अंधकार न रहे । हमारे जीवन का प्रत्येक दिन किसी ‘उत्सव’ से कम नहीं
ज़रूरत केवल ज़िंदगी को ज़िंदादिली से जीने की है।
मु्र्दा दिल क्या खा़क जिया करते हैं

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