पुकार सावन की️️
उमस भरे बादल को
ज्यों ही मिली तराई
गूढ़ हुआ रंग उसका
कुछ बूंदें रिस आई️
कुछ बूंदे रिस आई
फिर घन मटका छलका
गहन मरुस्थल में भी
कष्ट हुआ कुछ हल्का
कष्ट हुआ कुछ हल्का
पंख खुले जीवन के
टपके टप से ज्यों ही
चार बूंद के मनके
चार बूंद के मनके
मन के हर ले त्रास
माला पूरी प्रेम की
गुंथी मेघ के पास
गुंथी मेघ के पास
अब तो ना कर देर
अविरल धार बहा दे️
मन में घोर अंधेर
मन में घोर अंधेर
धूलधूसरित प्राण
बादल से बिछड़े तो
है पानी का मान
है पानी का मान
ये पुकार सावन की
सृष्टि हुआ मन मेरा
प्यास बुझे जन जन की