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किरदार

वैसे तो मैं कुछ ज़्यादा बोलती नहीं
बसंती की तरह बातों को तोलती नहीं

ठाकुर आ खड़े हो जाये लपेटे कम्बल
हाथों का मुआयना करने कम्बल खोलती नहीं

गब्बर सा कोई मुझ पर जो गुर्राए
तब इन xxxxxx के सामने मैं डोलती नहीं

यदि कोई कालिया साम्भा से पूछे होली की तारीख
अपना कैलेंडर कभी खोलती नहीं

कोई वीरू आ जाये मुझ पर डालने डोरे
उनकी जेबों को मैं टटोलती नहीं

कोई जय कर जाये मुझे अपनी गंभीरता से स्तब्ध
मौसी से अपने मन की बात मैं बोलती नहीं

कोई सूरमा भोपाली जब अपने मुंह मिया मिट्ठू बनता
राधा सी चुपचाप लालटेन ले अपना मुंह खोलती नहीं

और शोले के सभी किरदार मुझमें आज भी हैं बसते
उन्हें अपने ज़ेहन से कभी बाहर जाने देती नहीं

वैसे कितने आदमी थे? इतने ही न?
©ललिता वैतीश्वरन

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