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रितु अग्रवाल। (विधा : हाइकु) (कागज़ की कश्ती | सम्मान पत्र)

वह काँपती
कागज की कश्ती सी
तूफां लाँघती
आगे बढ़ती
पूर्ण निडरता से
स्व से लड़ती
गीली हो जाती
निरंतर चलती
स्वयं को पाती।
रितु अग्रवाल

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