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निशा टंडन। (विधा : कविता) (आभासी मित्र | प्रशंसा पत्र)

ना जाने दौर ये कैसा आया है
अपनों से ही मिलने को तरसता है दिल
फ़िज़ा में बिखरी हैं तनहाइयाँ
और हालात भी हैं थोड़े मुश्किल

जब ग़मों के बादल छाते हैं
और मन सुकून भरे लम्हे तलाश करता है
तब दूर कहीं मीलों से मुझ तक
एक दोस्त का पैग़ाम पहुँचता हैं

मिले हुए मुद्दत हुई हमें शायद
फिर भी खामोशी को मेरी वो समझता है
याद आती हैं अपनी मुझे बेफ़िक्रियाँ
फिर मिलने को उससे दिल तरसता है

पास ना होकर भी मौजूद है वो
मेरे हर ग़म में और मेरी ख़ुशियों में
जज़्बातों के सैलाब भी उसे अक्सर दिखते है
और शामिल होता हैं वो मेरी ख़ुशियों में

हो मीलों का फ़ासला आज भले दरमियान
पहुँच जाती है उस तक मेरे टूटे दिल की आवाज़
सुकून मेरे दिल को वो दे जाता है बिन कहे कुछ
और वहीं से होती हैं एक अटूट रिश्ते की शुरुआत
अभी हालातों का मारा है वो बेचारा
और चाहकर भी नहीं वो मेरे क़रीब
पर मेरी एक सदा पे वो चला आएगा
इस दिल को मेरे है उस पर इतना यक़ीन

Nisha Tandon

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