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भावना शर्मा। (विधा : लघुकथा) (काला धब्बा | सम्मान पत्र)

राशि आज फिर उन्हीं गलियों में थी ,जहां सालों पहले आना जाना हुआ करता था।पर इन सालों में समय की दरिया में बहुत पानी बह चुका है।अपनापन तलाशते उसके पिता हर छुट्टी गांव के घर आ जाते,उसे और उसकी मां को लेकर। पर दबंग दादी को वह फूटी आंख नहीं सुहाती थी।ताऊजी के दो बेटे थे और अपने पिता की वह इकलौती संतान।दादी तो उसके मुंह पर कह देती ,एक तो लड़की है ये ही धब्बा है ऊपर से काली ‘काला धब्बा’ है म्हारे छोरे पे।ऐसी बातों से दुखी हो पिता ने गांव जाना ही छोड़ दिया।सालों की मां पिताजी की मेहनत और उसकी लगन ने उसे आज सफलता के सबसे ऊंचे पायदान पर खड़ा कर दिया है तो वो फिर आई है पिताजी के साथ इस खुशी को बांटने।मन कुछ कुछ आशंकित ही है,क्या फिर से उन बातों को सुन पाएगी?सुना था उसने कि ताऊजी के दोनों बेटे पढ़ाई से दूर ही रहे और सिर्फ दादागिरी में ही मन रमता है उनका।कई छोटे मोटे झगड़ों में उनका नाम रहा है ।खैेर उसे क्या?ऐसा ही कुछ कुछ सोचते सोचते दादी का घर आ गया।गाड़ी से उतरते ही वहां की रौनक देख हैरान रह गई।क्या है आज यहां?इतने में ताईजी हाथ में पूजा की थाली लिए और दादी जल का कलश लिए उसकी आरती उतार रहे थे।आंखें छलछला आई उसकी, तो दादी ने आगे बढ़कर गले लगा लिया ।कहा’रो मत बचवा,म्हारे घर की सुंदरता पर चार चांद लगावे,वो कालो टीको है तू’ इस नयी मिली उपमा पर वह मुस्कुरा उठी।
भावना शर्मा

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