
प्रीति पटवर्धन ।(विधा : उद्धरण) (तो क्या | प्रशंसा पत्र)
तो क्या गर मेरे मुक्कदर में चाँद की रोशनी नहीं सितारें तोड़कर उजाला करने का दम रखती हूँ🌟🌠

तो क्या गर मेरे मुक्कदर में चाँद की रोशनी नहीं सितारें तोड़कर उजाला करने का दम रखती हूँ🌟🌠

तोक्या! अगर शहर छोटा है मेरा तंग गलियों में आशियाने यहां भी है नहीं अगर इमारतें गगनचुंबी वो मिलो मील खुले आसमान यहां भी है

तो क्या!!!गरआज वक्त थम सा गया है, माना बुरा है,कल फिर अच्छा आएगा ही। सूनी पड़ी हैं गलियां– तो क्या !!!!! कल वहां भी गूंजेगी

तोक्याहुआ “उफ़्फ़, क्या लड़की है? एक माँ है जो रोज़ उगता सूरज देखती है और बेटी की सुबह गुजरते दिन के साथ होती है…या अल्लाह

“तो क्या हम खुद से इतने दूर हो गए हैं कि आईने में अपनी सूरत पहचानी नहीं जाती ?“
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