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हेमलता मिश्र मानवी (UBI इंद्रधनुष प्रतियोगिता | वरिष्ठ कवि )

 सुनो   सुनो गगन – -सुनो ना।

                तुम 

–           अथाह विशाल विस्तृत निराकार

        खोखले गव्हर में मात्र निविड़ अंधकार!!

 सौभाग्य तुम्हारा

      भर लेते हो इंद्रधनुष को अपनी बाहों में

      दमक उठते हो किरण संग इंद्रधनुषी रंगोली रचकर।। 

      समा लेते हो धरा के

बैंजनी फूलों का रस

   मेघ और बदली का

आसमानी रिश्ता

       पी लेते हो समंदर का सारा

नील–सरिता की निर्मल खामोशी

       ओढ़ लेते हो सावनी धरा की 

हरित चूनरी धानी

   बन्नी अवनी पर चढ़ रही हल्दी का

पीताभ नूर

       चुरा लेते हो बरखा की मांग का 

नारंगी अष्ट गंधी सिंदूर

         घूंघट में मुख छिपाए  रश्मि की 

लाल शर्मीली मुस्कान

          समेट लेते हो प्रकृति का सतरंगी आंचल अपनी बाहों में

   धीरे से ढंक लेते हो पछुआ ऊषा को 

       और कभी पूरबी संध्या को बांध लेते हो अपनी क्रोड़ में।।

        चंचल चमकीली किरण बूंदों संग लुटाती रहती है अपना पूरा किरदार

        प्यासी धरा पर बरस बरस बरस

चुके बादल को पहना सतरंगी हार।। 

            सोचती हूँ काश

          बरस बरस रिक्त मेघों संग बतियाती बदली

      सूरज संग इठलाती रश्मि

                मेरे लिये भी होती।।

और इंद्रधनुष रच कर

       मुझे सौगात दे जाती।।

ओ किरण सुनो सुनो ना

        बरखा की बूंदों संग

      एक इंद्रधनुष मेरी हथेली में भी रचाओ ना

 काश – – – – 

           एक इंद्रधनुष मेरे लिए भी!!!

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