Generic selectors
Exact matches only
Search in title
Search in content
Post Type Selectors

हमीदा हकीम। (विधा : कविता) (खामोशी | सम्मान पत्र)

खामोशी
सतह पर जमे झाग सा, ये शोर दिन रात का
गहराईयाँ नहीं मापता, खामोशियाँ नहीं भाँपता
एक दुनिया जो पलती है वहाँ दिखती नहीं
खामोश सदाएं सफर करती वहाँ कहती नहीं
कई उफनते भंवर को तूफान नहीं बनने देती
खामोशी मगर शिकायतें तह ब तह जमने देती
फिर ओढ़ कर उनको तन्हाई में सिसकती है
खामोशी बेअवाज़, बेइलाज चीखती है
क्या सुनी है कभी ,अक्सर सुनाई देती है
कभी कहकहों में खनक जाती है
कभी आँखों से  छलक जाती है
कभी कागज़ पर उभर आती है
कभी गीतों में भी भर जाती है
सामने हो कर भी छिप जाती है
अनजानी पहचान बन जाती है
अनकही अनसुनी खामोशी।
             हमीदा हकीम

Leave a Comment