आवाज़ ही तेरा गहना है
वाह! तेरा क्या कहना है।
सिर्फ बसंत में गीत गाते हो
फिर कहाँ छिप जाते हो?
क्यों सुनाई नहीं देती तेरी मीठी कूक?
अजीब तेरे रंग ढंग, अजीब तेरी भूख।
क्यों नहीं बनाते घोंसले अपने
अपना घर होने के नहीं आते सपने?
क्या अच्छा लगता है घुसपैठ करना
औरों के घोंसलो में अपने अंडे रखना?
अपना काम करने में आलसी हो जाते हो
औरों के अंडे तोड़ कर चैन से सो पाते हो?
क्या इसीलिए शर्माए फिरते हो दिखाई नहीं देते,
कर के कांड चुप हो जाते हो सुनाई नहीं देते ?
ये कोई चालाकी है या फिर मजबूरी है तुम्हारी
क्या इसी तरह चल सकती है तुम्हारी ज़िम्मेदारी?
अगर क़ुदरती फ़ितरत की बात है
तब तो कुछ भी नहीं तेरे हाथ है ।
गुण अवगुण तो सब के साथ है।
पर जब कभी मीठी आवाज़ की बात होती है
सच कहें कोकिला तेरी ही याद होती है।
हमीदा हकीम