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सुशीला गंगवानी। (विधा : लघुकथा) (काल करे सो आज कर, आज करे सो अब | प्रशंसा पत्र)

मैं गीता छब्बीस साल की एक शादी शुदा महिला हूं।मेरा मायका एक छोटे से शहर में है।ससुराल वाले एक अच्छे बड़े शहर में बसते हैं।मेरी सगाई अक्टूबर महीने में हुई थी और मेरे ससुराल वाले जनवरी में शादी की तारीख पक्की करने को कह रहे थे।हमारे घर के आर्थिक हालत कुछ ठीक नहीं थे सो बाबूजी अभी शादी की बात एक साल तक टालना चाहते थे।दोनो पक्ष की आपस में चर्चा विचारणा हुई और सब ठीक चलने लगा।मेरे साथ हररोज मेरे मंगेतर की बात फोन पर होती थी।वोह हमेशा एक ही बात कहते कि तुम अपने माता पिता को समझाओ कि इसी जनवरी में शादी करवा दें लेकिन मैं हर बार उन्हें दिलासा देती कि क्या फर्क पड़ता है अगर शादी एक साल बाद भी होगी तो लेकिन वोह माने ही नहीं।मैंने आखिर एक दिन मां से यह सब कह ही डाला कि “मा वोह लोग चाहते हैं कि शादी जितनी हो सके जल्दी करनी है वोह लोग हम से कुछ लेनदेन भी नहीं चाहते सिर्फ सादगी से शादी करके मुझे अपने घर ले जाना चाहते हैं।” मा ने बाबूजी से बात की आखिर हमारी शादी बिल्कुल सादगी पूर्ण तरीके से हो गई।दो महीने बाद यानी कि मार्च महीने से तो बिल्कुल सब जगह कोरॉना ने कहर मचाया और लोक डाउन होने लगा।इस वक्त मैं अपने पति और ससुराल वालों के साथ बहुत खुश हूं और मां बाबूजी भी बहुत ही खुश है कि अच्छा हुआ कि दामादजी की बात मान ली और लड़की को अपने घर विदा कर दिया।वरना जिस तरह से आज के हालात चल रहे हैं वोह देखकर तो लगता है कि ना जाने क्या होता?इसी लिए कहते हैं ना कि एक कहे तो दूसरा माने। “काल करे सो आज कर,आज करे सो अब।”
जय श्री कृष्णा 🙏🙏

स्वरचित –
सुशीला गंगवानी

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