दुःख सुख की कहानी,वसीयत की ज़ु
वसीयत लिख दूँ एक ही नसीहत पे,
प्यार है, प्यार उड़ेल दिया का
क्या क्या बचाया है ज़िंदगी के
दिल और जिगर का हिसाब इन दोनो में
कोख मेरी प्यारी जिसमें जान थी
लहू से सींचा प्यार,जन्नत देखी
वसीयत नहीं है काग़ज़ के पन्नों
दिल है बस्ती कतरे कतरे में बसा
वसीयत काग़ज़ का पुर्ज़ा बन जा
जब दुआ वं ख़ुदा मिल जाएँ पास पा
चंद अल्फ़ाज़ों की वसीयत जला दे
ग़र
दिख जाए ईर्षा, स्वार्थ,द्वेष औ
दुःख सुख की कहानी,वसीयत की ज़ु
स्व-रचित 
“सपना अरोरा”