“काग़ज़ की कश्ती”है तो क्या ?
सम्भाल कर रखना,हे दोस्तों ,
यादों का परवाना,तलातुम का सहा
यह काग़ज़ की कश्ती,बचपन का ख़
याद है वो ज़माना
पन्ना जो किताब का,खिलोना बरसात
वो बारिश की बूँदे,मेघों का बरस
छप छप करते,पानी में खेलना
काग़ज़ की कश्ती को धकेलना
पानी में छप छपाते,पाँव रखना, चं
हँसना और हँसाना,
कभी न भुलाना,काग़ज़ की कश्ती,
बचपन का ख़ज़ाना!
धुंधली न करना,वो यादें,
गलियों और चोबारों के नाते
आकाश में टिम टिमाते तारों से बा
बरसाती फुहारों के दिन और रातें
बादलों में छिप कर आते,
बारिश की बूँदों के मोती,
जल की धारा संग,
इठलाते और लहराते,
काग़ज़ की कश्ती संग,
बच्चों की किलकारियाँ,
बयाँ कर जाते।
कभी ना भुलाना,काग़ज़ की कश्ती,
बचपन का ख़ज़ाना।
पवित्रता की दृष्टि,महफ़ूज़ सी
काग़ज़ की कश्ती,गर मन में जागे
काश…
कभी न भुलाना, काग़ज़ की कश्ती,
बचपन का ख़ज़ाना।।