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श्याम सुन्दर शर्मा (विधा : कविता ) (चलती रहे ज़िंदगी | प्रशंसा पत्र )

चलती रहे जिंदगी

रेलगाड़ी सी बेतहाशा रफ़्तार से चल रही,
कभी खट्टी तो मीठी यादों में ढल रही,
सरपट दौड़ते दृश्य अद्भुत प्यारे,
पीछे छूटते जा रहे कई दिलकश नज़ारे,
फर्राटे से गुजर रहे कई गुमनाम स्टेशन,
सदा के लिए यादों में बस कुछ जंक्शन,
भीड़ की आड़ में कुछ लोग घुसे आ रहे ,
चोरी, चालाकी के करतब कई दिखला रहे,
ताल पर झूमता शोर जैसे संगीत है,
हड़बड़ी, आपधापी की यहां सनातन रीत है,
चुस्त चहलकदमी की सदा सुगबुगाहट है,
किसी अनजान मासूम चेहरे खिली मोहक मुस्कुराहट है,
कोई सौदागर आदतन ऊंचा बोल रहा है,
कोई में फुसफुसाकर कानों में मिश्री घोल रहा है ,
कुछ हसीन शोख़ अदाओं से लुभाते,
बदी अदा से बेवजह मंद मंद मुस्कुराते,
चुपचाप बोलती आंखों से कितना कुछ कह जाते,
करते वादे फिर बीच में अचानक उतर जाते,
जेहन में जब तब उभरते रहते हैं कुछ अक्स रंगीन,
गुजरा सोहबत में जिनके कुछ वक्त हसीन,
याद हमेशा आते वे चुनिंदा हमसफ़र,
हर नई भीड़ आदतन खोजती
उन जैसा मेरी नजर ,
लड़खड़ाकर भी फिर संभलती रहे,
लंबी रेल यात्रा सी,

चलती रहे ज़िन्दगी।

~ श्याम सुन्दर शर्मा

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