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डॉ शैलबाला दाश (UBI सावन की पुकार प्रतियोगिता | सहभागिता प्रमाण पत्र)

सावन की पुकार

डॉ शैलबाला दाश।

बैशाख के शाख से जब झड़ गये सारे फुल,

तप्त धरा जब खरा की आगोश में शांति, शीतलता जाए भूल,

चिख चिख कर हर प्राण जब लगाते हैं यह गुहार,

आये बारिश, आये सावन ले कर अपना  फुहार।

मन हो हर्षित,तन  हो रोमांचित,सावन लगे वहार।

आया सावन झुमके,साथ में अपना अंदाज से  सुर,लय ,ताल ।

ऐसे बहाव जो भर गये मन,पूर्ण हो गये सारे बिल।

कोकिल काक बन गये मूक,बादल गरजे जैसे,

संगत में रंगत भरे मेंढक,झिंगुर कानों के पास  ऐसे।

केका के कर्कश, आवाज़ के तरकस के आगे जांवाजों के घुटनें भी टेकें,

सावन की फुहार,लगे फुत्कार जब 

छत से पानी के धारें टपकते दिखें।

सावन की ये बुंदे, इतने ठंडें,मन  सराबोर हो जाए।

घनघोर घटा, कवियों के मन में कविता के वहाब,स्रोत बन कर वह जाए।

फुलों के मित्र, खुशबू ईत्र,लगने लगते हैं इतने फिके,

पहली वारीश की बुंदों को जब धरती प्रफुल्ल मन से अपनी कोख में शोखें।

मंद मधुर मनमोहक महक से महकतीं जाएं है यह धरा।

सावन की फुहार , बादलों के संगत में 

लगें अद्भुत प्यारा न्यारा।

मन में  कामना का इंन्द्रधनुषी रंग,

कामदेव बिन फुलों के धनुष से ऐसे दागें,

सावन की पुकार,ऐसे हो साकार निष्काम मन में भी काम जागे।

हर सर भरें,तटिनीयां तट लांघे,उषर धरा हो जाए हरा ।

निष्प्राण में भी भर जाएं प्राण,शुन्य लगें भी भरा।

सावन की पुकार, प्रेमियों को जोड़े,

विरही प्राण में  ऐसे आग लगे,

बंद आंखों से यह धुन से लीन मन कहीं और दुसरे जगत में भागें।

है ऐसे करीश्मा,पानी से आग बुझे नहीं,

ऐसे ही आग लगाए,

मन हो भिगे, तन हो भिगे ओर भिगने को मन कहीं और भाग जाए।

सर्ब स्वत्व संरक्षित।

 

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