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लौटे हम फिर अपने घोंसलों में

खो गए थे यूँ कहीं हम
इस ज़िन्दगी की दौड़ में
ना सुध थी.. खड़े थे कहाँ
ना मंज़िल का पता था

सफ़र तो सफ़र था
इसे चलते ही था रहना
मगर यूँ चलते चलते..साथ रहा ना कोई
सूनी सी राहे..बेमतलब सी ख्वाहिशों के सिवा

दिन बीतें..बरस लगे..बीती सदियां लंबी
ना मिली मंज़िलें
ना मिली ख्वाहिशें
ना मिला जीवन का सार

आज मायूस हुए से बैठे है
अपने घोसलों में यूँ थक कर
मंज़िलें ना सही..राही कुछ साथ है
ख्वाहिशें ना सही..सुकून साथ है

ये कुदरत का है करिश्मा..या तेरी रहमत है ऐ ख़ुदा
भागे जा रहे थे जिसे पाने को पहर पहर
मिला अपने में ही.. जब झांका बैठे बैठे
अपने भी..अपनापन भी
सुख भी..सुकून भी
संतोष भी..मन की शांति भी

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