खोल रे बंधु मन की किवड़िया
तनिक रोशनी तो आने दे
मैं हूँ अघोरी ह्रीम क्लीम से
अंदर का भूत भगाने दे !!
जाला बुनता अंधकार का
तुम्हरे मनवा में भ्रम का मकड़ा
फिर ऊछल कूद कर भूत प्रेत बन
तुम्हरे विवेक को है जकड़ा
जला कर रख बुद्धि की मशाल
अंधविश्वास को बाहर जाने दे
मैं हूँ अघोरी ह्रीम क्लीम से
अंदर का भूत भगाने दे !!
काम क्रोध मद लोभ दंभ के
दैत्यों को बनाया तूने बड़ा
इनकी करनी जब हुई भरनी
भूतहा बोझ तेरे अंतर्मन पे पड़ा
तेरे मन के अनपढ़ दानव को
ज्ञान का चोगा पहनाने दे
मैं हूँ अघोरी ह्रीम -क्लीम से
अंदर का भूत भगाने दे !!
मूरख समझ रहा जिसे भूत तू
वो है तेरा वहम और ड़र
ज़िगर कड़ा कर हिम्मत भर ले
बना ले एक बलशाली घर
तेरी भ्रष्ट मति पर अब कुछ
साक्षरता का दीपक जलाने दे
मैं हूँ अघोरी ह्रीम – क्लीम से
अंदर का भूत भगाने दे !!
