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ललिता वैतीश्वरन(विधा : लघु कथा) (फूल खिले हैं गुलशन गुलशन | प्रशंसा पत्र)

कितनी गलत थी मैं …जो अपने आप को इस बेरहम समाज से अलग समझ रही थी ..
एक पढ़ी लिखी स्नातकोत्तर नौकरी पेशा महिला ..सुलझे विचारों वाली ….ये काफी नहीं होता समाज में रहने के लिए ….समाज आपको कटघरे में खड़ा करता ही है …
शादी के दो सालों में ही तीन बार गर्भ पात हो गया …फिर क्या था…वही वीरानी …वही उदासी …वही लोगों के कभी न खत्म होते प्रश्न !!
साल गुजरते गये ..इस चिकित्सक से उस चिकित्सक की दौड़ भाग में 8 साल बीत गये ….
कृत्रिम गर्भ धारण के भी कई विफल प्रयास हुये जो न केवल जेब को अपितु मन को भी खोखला करते जा रहे थे …
मेरा धैर्य जवाब देने लगा था …लोगों से मिलना जुलना या बातें करने से मैं कतराने लगी थी …
गोदी में बच्चे को उठाये एक भिखारन भी मुझे अपने से ज़्यादा दौलतमन्द और भाग्यशाली लगती …
पति और मेरे बीच की बातचीत सिर्फ हाँ न में सीमित हो गयी थी …
बच्चा गोद लेने की बात किताबों और फिल्मों में अच्छी लगती है…स्वयम पर जब आती है तो मन कई प्रश्नों से घिरने लगता है ….
कहते हैं भगवान के घर में देर है …अंधेर नहीं ..
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अचानक एक दिन ……मेरा वीरान हृदय शाहनाई बजाने लगा …मेरे अंधेरे कोनों में दीये जल उठे ….हर सूखी शाख पर नव कोपल खिल उठे ….हर गुलशन रंग बिरंगे फूलों से महक उठा ….
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मेरे घर भी आयी एक नन्ही परी …..
©️ललिता वैतीश्वरन

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