देह के दंश से परे
यौवन की मुस्कान
चंचल चकित चितवन भरे
सपनो की उड़ान
जग में चहुं ओर प्रीत है
पुष्प खिले हर बाग़
चारों दिशाओं में गूँज रहा
जलतरंग का राग
जों बारिश में झूमते
पपीहरे के प्राण
चंचल चकित चितवन भरे
सपनो की उड़ान
राग रागिनी एक सम
और समदृष्टा नेह
ग्रीष्म ऋतु में शीतल है
शीत में तप्त है देह
रूप कौमार्य का भरा
मानस में अभिमान
चंचल चकित चितवन भरे
सपनो की उड़ान
प्रिय की पदचाप के
अजब अलग है ढंग
प्रेम भरे हर ओर है
इंद्रधनुष के रंग
तरुणी हँसे मन ही मन
खिले अधरों पर मुस्कान
चंचल चकित चितवन भरे
सपनो की उड़ान