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भार्गवी रविन्द्र । (विधा : कविता ) (साथी हाथ बढ़ाना | वरिष्ठ लेखिका)

कविता : आशाओं का उगता सूरज बन दिखाना है
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कोरोना से ग्रस्त धरा पर आज हर ओर मचा है हाहाकार
कोरोना से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ रही है लगातार।
इस चक्रव्यूह को भेदने में जुटा है ,आज ये सारा संसार
मानवता के संग कोरोना की जंग है ,हमें इसे हराना है।

ज़हर बनकर फैल रही ये महामारी ,सबकी नस नस में
नाग सा फन फैलाए ये आया ,सारी दुनिया को डँसने ।
लग रहा है आज समस्त कायनात है ,इसके बस में !
साथी !एकजुट होकर हमें इसका नामोनिशान मिटाना है ।

ये सब हमारे वीर सैनिक हैं ,जो हर पल तत्पर रहते हैं
अपनी जान की रत्ती भर परवाह नहीं इन्हें,डटकर रहते हैं।
इस अदृश्य आपदा के घेरे में दिन रात बंधकर रहते हैं
इनके संग कंधा मिलाकर इनका हौसला हमें बढ़ाना है।

हम ज़रा भी चूके तो संकट के ये काले बादल जाने कब छँटे
ये जंग जीतना है हर हाल में हमें,देखो आज कोई न पीछे हटें।
घनघोर अँधियारी रात पर,हम हजारों रश्मि पुंज बनकर फटें
ढलता सूरज नहीं,आशाओं का उगता सूरज बन दिखाना है ।

इसे लक्ष्मण रेखा न समझ,ये रेखा है हमारे धैर्य व साहस की
अपने में छुपे आत्मबल की ,हमारे योद्धाओं के विश्वास की ।
हमारे प्रेम की पराकाष्ठा की, तमिस्त्रा को चीरते प्रकाश की
इस लक्ष्मण रेखा को पार न करने का अपना वचन निभाना है।

वो जो लड़ रहे हैं हमारे लिये ,मिलकर उनके लिये दुआ करें
उनके जीवन ,उनके परिवार की ख़ुशहाली के लिये दुआ करें।
हमारी प्राणों की रक्षा में,मौत से जूझ रहा उनके लिये दुआ करें
कुरुक्षेत्र ये संसार,पाँचजन्य की है पुकार ,साथी हाथ बढ़ाना है ।
सर्वाधिकार सुरक्षित(C) भार्गवी रविन्द्र…
स्वरचित,मौलिक व अप्रकाशित …सर्वाधिकार सुरक्षित

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