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नीति अनेजा पसरीचा। (विधा : गीत) (एक पैगाम पिता के नाम | सम्मान पत्र)

आज बहुत दिन बाद पीहर से चिट्ठी आई है।
आज बहुत दिन बाद पीहर से चिट्ठी आई है।

जो मेरे माँ पापा का प्यार,साथ में लाई है।
जो मेरे माँ पापा का प्यार,साथ में लाई है।

इस चिट्ठी को पढ़कर मेरी आंख भर आई हैं।
इस चिट्ठी को पढ़कर मेरी आंख भर आई हैं।

पापा की अब याद मुझे दिन रात सताई है।
पापा की अब याद मुझे दिन रात सताई है।

बचपन की यादें हा कितनी प्यारी होती थी।
बचपन की यादें हा कितनी प्यारी होती थी।

जब मैं अपने पापा की,लाडो रानी होती थी।
जब मैं अपने पापा की,लाडो रानी होती थी।

पापा कि वो लाडो,गोदी बैठके ही मीठा खाती थी।
पापा कि वो लाडो,गोदी बैठके ही मीठा खाती थी।
जो पापा कर दे इनकार कभी तो, वो रूठ जाती थी।

यादें वो बचपन की बड़ी अनमोल होती हैं।
यादें वो बचपन की बड़ी अनमोल होती हैं।
याद उन्हें कर कर के, ये आंखें हरदम रोती हैं।

याद आज भी आता है, पापा का हर एक कहना।
याद आज भी आता है, पापा का हर एक कहना।
जाकर भी ससुराल तू मेरी ही,लाडो रहना।
जाकर भी ससुराल तू मेरी ही,लाडो रहना।

आज बहुत दिन बाद पीहर से चिट्ठी आई है।
जिसको पड़ कर पापा की याद और सताई है।
जिसको पड़ कर पापा की याद और सताई है।
– नीति अनेजा पसरीचा

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