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नीति अनेजा पसरीचा। (विधा : कविता) (दादी नानी की कहानियाँ | प्रशंसा पत्र)

वो पल भी कितने प्यारे थे,
हाय, यादें वो कितनी मस्तानी थी,
बचपन की हर एक याद कितनी सुहानी थी,

ना कोई चिंता मन में, ना कोई परेशानी थी,
बस सुबह से शाम मस्ती की खुमानी थी,

हां, वो पल कितने प्यारे थे,
हां ,यादें वो कितनी मस्तानी थी,

जब सुबह सवेरे जागते ही, पहला सवाल यह होता था,
आज बनाया है क्या खाने में मां ,बस यही विचार मन में होता था,

हां , वो पल कितने प्यारे थे ,
हां ,यादें वो कितनी मस्तानी थी,

जब सुबह सवेरे मन का पंछी आजाद उड़ जाता था,
कहां गए वह बचपन के पल ,जब यह मन पंछी बन जाता था,

हां ,वो पल कितने प्यारे थे ,
हां ,यादें वह कितनी मस्तानी थी,

आज सताती है वो यादें, जब यार दोस्त गर्मियों में आइसक्रीम खाते थे,
मेरी ज्यादा अच्छी मेरी ज्यादा अच्छी कहकर एक-दूसरे को चिढ़ाते थे,

हां, वो पल कितने प्यारे थे,
हां ,यादें वो कितनी मस्तानी थी,

कहां गया वो बचपन जिसकी यादों मे मासूमियत की निशानी थी ,
न मन में कोई छल कपट ,न ईर्ष्या की निशानी थी,

वो पल भी कितने प्यारे थे,
हाय,यादें वह कितनी मस्तानी थी ,
बचपन की हर एक याद कितनी सुहानी थी।
कितनी सुहानी थी ।
कितनी सुहानी थी ।

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