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निशा टंडन। (विधा : कविता) (राज़ | प्रशंसा पत्र)

ज़िंदगी का सफ़र आसान तो नहीं
फिर भी हर रस्म निभाए जा रहे हैं हम
और एक बनावटी मुस्कुराहट के पीछे
छुपाए जा रहे है अपने हर ग़म

कहना चाहते है किसी से बात दिल की
पर मिलता ऐसा कोई हमराज़ नहीं
कैसे अंजाम पर पहुँचा दे वो क़िस्सा
जिसका अभी तक हुआ आग़ाज़ नहीं

बन कर राज दफ़्न है हर बात सीने में मेरे
घुट घुट कर जीना है अब हमें उनके साथ
सुनाएँ किसे बेचैन कर रही है हर लम्हा
दर्द और आँसुओं की अनकही दास्तान

खोल दें ग़र राज ग़ैरों के सामने
तो ज़रा सी बात का तमाशा बन जाएगा
सोच कर डरते हैं कि वो मंज़र कैसा होगा
इसका अंजाम तो वक्त ही हमें बताएगा

इस कश्मकश के दौर से गुजरते हैं अक्सर
ये बात हमारे लिए कोई नई तो नहीं
जब मिलता नहीं सवालों का जवाब
तो दफ़्न कर देते हैं वो राज फिर वहीं

निशा टंडन

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