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नरेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ( उत्सव प्रतियोगिता | प्रशंसा पत्र )

फिज़ा में घुल रही सर्दी, गुलों पर नूर आया है
हवा मे तैरती खुशबू , कुछ सुरूर आया है

बंधे हैं द्वार पर तोरण , रंगोली के नजारे हैं
फटाखों के धमाके हैं, चिराग़ों की कतारें हैं

दुकानों में जो देखो , सब कुछ नुमाया है
बाजारों में जमघट है , अजी त्यौहार आया है

मिठाई की महक मन को, ललचाए जाती है
रसगुल्ला, संदेश, जलेबी, मन को लुभाती है

कहीं जेवर की ख्वाहिश तो,कहीं कपड़ों की चाहत है
कहीं घर को सजाने को, सामां की चाहत है

बच्चों की खुशियां तो मगर सबसे निराली हैं
फटाखे हों, खिलौने हों, मिठाई में दिवाली है

शहर सारा का सारा ही, रौशनी में नहाया है
फ़लक से आज छुट्टी ले, ज़मीं पर चांद आया है

मची है धूम घर घर में, उमंगों में रवानी है
गो सो रहा सूरज, पर दियों की निगहबानी है

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