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दिव्य सेठी। (विधा : कविता) (आकाशगंगा | सम्मान पत्र)

कैसे लिखूँ सार मैं उसका
जिसका कोई पार नहीं
है समेटे धरती आसमां
साथ सितारें और कईं

घोर घना है रूप जो इसका
धूल, गैस से मिश्रित है
है अनंत इसकी ये काया
केंद्र बिंदु से बाधित है

करते विचरण धूमकेतु
उल्का और क्षुद्रग्रह अनेक
सुंदर अति मनमोहक दृश्य
लगे है चित्र यूँ एकाएक

अरब खरब सौरमंडल के
मेल का है ये अद्भुत काम
क्षीरसागर में रहते हम है
आकाशगंगा है इसका नाम
– दिव्य सेठी

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