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ग़ज़ल

ग़ज़ल ( आदत न रखे )

जवानी से उलझने की, नीयत न रखे।
दख़लंदाज़ी करने की, जुअरत न रखे ।।

ऐसे दौर से गुज़रना अनहोनी बात नहीं।
जवाँ हसरतें बाँधने की, हसरत न रखे।।

विवशता इस समय उन्हें भी सता रही।
अंगारों को बुझाने की नसीहत न रखे।।

नौजवानी में तीरे – नीमकश का मारा है।
ध्यान रहे, खुली घर की छत न रखे।।

इश्क मकड़जाल, हर उमर पर बुनता है।
कमउमर पर सियासी, तख़्त न रखे।।

चोट का दर्द क़ायम नहीं रहेगा, दस्तुर है।
हर वक्त, मत देने की आदत न रखे।।

अंजाम जो होगा बरखुरदार झेल लेगा।
“आभा”पहरेदारी बच्चों पे सख़्त न रखे।।

बरखुरदार – बेटा या बेटी
तीरे नीमकश – आधा धँसा हुआ तीर, ख़लिश

आभा….🖋

One Comment on “ग़ज़ल

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