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कविता :देवों के देव

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कविता :देवों के देव
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हे भोलेनाथ
तेरे भक्त होकर मैं कैसे हो गई अनाथ?
थोड़े गुहार लगाने से
अल्प समय में संतुष्ट होने वाले
हे आशुतोष
कब तक मेरे ऊपर रहोगे रुष्ट
हे देवों के देव महादेव
हे महाकाल
नित्य जप करुं मैं महामृत्युंजय मंत्र
हर ओंकार में तुम हो ओंकारेश्वर
प्रकृति के तुम पुरुष
संसार के हित के लिए
हलाहल पीकर बने नीलकंठ
फिर दुनिया के लिए मैं कैसे बनगई विष कुम्भ
तु मंगलमय शिव
तेरे दरवाजे पर खड़ा मैं
मेरे मुंह सुबह कोई देखना कैसे अमंगल ?
दया कर दे
राह दिखा दे भगवान
स्व रचित
अमीता दाश 🙏

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