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……ओस……

रात भर सोखती है नमी….
जमती है
भीगी-सी सुबह तक
फिर धूप की बूंद पीकर ,
सारी पहर छुपती-छुपाती
शाम ढलते ही
ऑंखों के ऑंगन में उतर आती है
रात भर सराय कर इन्हें
सुबह पलकों पे
रोज़ ठहर जाती है ‘ओस’…….

©डा.टीना गुलज़ार…….

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