खामोशी!
काफी दूर तक, देर तक, आवाजें जब पीछा नहीं छोड़ती ,
खामोशी! तुम्हारी नामौजूदगी खलती है, तुम याद आती हो ।
तुम्हारी गहनता, सघनता मुझे स्वयं को ढूंढ़ने में मददगार है,
तुम्हारे विस्तार में मेरे जीवन का विस्तार देख पाती हूँ,
तुम्हारी शांत प्रवृति मुझे विचारों के भँवर से उबारती है ।
अपने आन्तरिक द्वंद्व को समझने में मेरी सहायक बनती है,
मैं कोलाहल से दूर, तुम्हारे सानिध्य में शांतचित्त होती हूँ,
ध्यानमग्न रह पुनः अपनी शक्ति का स्रोत खोज निकालती हूँ।
तुम शिवतुल्य हो! तुम जीवन का मर्म उजागर करती हो,
‘ पद – प्रतिष्ठा से उत्पन्न अभिमानी शोर, जीवन नर्क कर देगी’।
तुम्हारा मूल्य जानने वाले, हर क्षण तुम्हारी समीपता चाहते हैं,
तुम संबल हो उनका जिन्हें शोर ने बर्बाद कर दिया।
आराधना अग्रवाल