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आराधना अग्रवाल। (विधा : कविता) (वो महंगे जूतें | सम्मान पत्र)

 वो महंगें जूते
जिंदगी की हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करते हैं,
इंसान इसी वजह से जी तोड़ मेहनत किया करते हैं,
चाहत थी उसकी महंगे जूतों से रुतबा बढ़ाने की,
आत्मविश्वास से भरे कदमों से सफलता पाने की।
चमकते हुये, अपनी शान बिखेरते हुए वो महंगें जूते!
तरक्की की सीढ़ी चढ़ते देखा उसने पहन उन्हें सपनों में ।
प्रतिदिन वो जूते आसमान के चाँद सा लुभाते थे उसे,
‘ले आऊं उन्हें पास मेरे’ यह लालसा जगाते थे उसमें।
पाई – पाई जोड़ी, अपनी जरूरतों को कम करने लगा,
पर धीरे – धीरे उसे अपनी बेबसी का अह्सास होने लगा,
खुश रहता था जो हर वक़्त, हालात को कोसने लगा।
जब जब देखता वह वो जूते, चिढ़ाते हुए मिलते उसे,
‘हम तुम्हारी औकात से दूर हैं’ मानो सुनाते रहते उसे।
एक दिन खरीद ही लाया उन्हें, पहन पहुंचा अपने कार्यालय,
सामना हुआ अजीब घूरती नजरों का, मानों कोई अजूबा है,
वो महँगे जूते पुरानी पोशाक पर मखमली पैबंद से थे।
खुशी जो पायी उसने, लंबे इंतजार के पश्चात, कष्ट सह,
ऐसा लगा उसे लूट मिनटों में भाप सी उड़ गई।
डिब्बाबंद आज किसी कोने में पडी है चाहत उसकी
पहन उसे इतराने का मौका आया ही नहीं कभी।
आराधना अग्रवाल

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